महामृत्युंजय मंत्र (Mahamrityunjaya Mantra)



महामृत्युंजय मंत्र (Mahamrityunjaya Mantra)
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महामृत्युंजय मंत्र संसार का सबसे बड़े मंत्र माना जाता है। महामृत्युंजय मंत्र को मृत्यु विजयी मंत्र कहा जाता है। इसके अलावा महामृत्युंजय मंत्र को त्रयम्बकम मंत्र भी कहा जाता है। यह मंत्र भगवान शिव को समर्पित है। महामृत्युंजय मंत्र का जाप लम्बी आयु के लिए किया जाता है। यह माना जाता है, महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से  मानसिक शांति मिलती है। यह एक शक्तिशाली महा मंत्र है।  ऋषि-मुनियों ने महामृत्युंजय मंत्र को वेद का ह्रदय कहा है।

महामृत्युंजय मंत्र (Mahamrityunjaya Mantra) 108 times

महामृत्युंजय मंत्र

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌।

उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।।

महामृत्युंजय मंत्र 32 शब्दों से मिलकर बना हुआ है इस मंत्र के पहले ॐ जुड़ने से कुल 33 शब्द हो जाते हैं। इसीलिए महामृत्युंजय मंत्र को ‘त्रयस्त्रिशाक्षरी‘ मंत्र भी कहा जाता है।

महामृत्युंजय मंत्र का हिंदी अर्थ

– हे ओंकार स्वरूप परमेश्वर

त्र्यंबकम् – तीन आँखो वाला, तीनों कालों में रक्षा करने वाले भगवान को

यजामहे – हम पूजन करते है, सम्मान करते हैं, हमारे श्रद्देय

सुगन्धिं – मीठी सोहन्दी सी महक वाला, सुगन्धित

पुष्टि – एक सुपोषित स्थिति, फलने वाला व्यक्ति। जीवन की परिपूर्णता

वर्धनम् – वह जो पोषण करता है, शक्ति देता है, जो हर्षित करता है, आनंद और स्वास्थ्य प्रदान करता है

उर्वारुकमिव – ककड़ी

इव – जैसे, इस तरह।

बन्धनात्  (तना) वास्तव में समाप्ति से अधिक लंबी है।

मृत्योर्मुक्षीय  हमें मृत्यु के बंधन से स्वतन्त्र करें

माऽमृतात् – नहीं वंचित होएँ, अमरता से

महामृत्युंजय मंत्र का हिंदी में अर्थ

इस मंत्र का सरल अर्थ यह है कि हम भगवान त्रिनेत्र धारी यानि की जिनके तीन नेत्र (आँखे) है उन महादेव शिव की पूजा-अर्चना करते हैं, जो हर प्राणी के श्वास में जीवन शक्ति का संचार करते हैं और पूरे जगत का पालन-पोषण करते हैं।

जाप करने का समय और विधि

सुबह और शाम को एकान्त स्थान में बैठकर आँखों को बन्द करके एकाग्र मन से इस मंत्र का जाप 11- 108 बार करने से मन को शान्ति मिलती है और मृत्यु का भय दूर हो जाता है।

महामृत्युंजय मंत्र की उत्पति

महामृत्युंजय मंत्र की उत्पति का संबंध यजुर्वेद के रूद्र अध्याय से है। एक पौराणिक कथा के अनुसार ऋषि मृकण्डु और उनकी पत्नी ने भगवान शिव की तपस्या की और पुत्र प्राप्ति के लिए वर माँगा। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने वरदान तो दिया लेकिन साथ-साथ यह भी कहा की यह बालक बहुत तेजस्वी होगा लेकिन अल्पायु होगा। यानि की उसकी मृत्यु 16 वर्ष आयु में होनी थी। कुछ समय बाद जब ऋषि मृकण्डु को पुत्र सुख की प्राप्ति हुयी तो उन्होंने अपने पुत्र मार्कंडेय को भगवान शिव की स्तुति और मंत्र का उन्चारण बताया और साथ-साथ उसे वरदान के बारे में बताते हुए कहा की भगवान शिव ही इसका उपाय कर सकते है।  इसके बाद ऋषि मार्कंडेय ने भगवान शिव को तपस्या शुरू कर दी।

उनकी आयु पूरी होने पर जब यमराज ने उन्हें लेन के अपने यमदूत भेजे लेकिन ऋषि मार्कंडेय महादेव की तपस्या में ध्यान मग्न थे और यमदूत उन्हें ले जाने में असमर्थ रहे फिर यमराज ने स्वयं आने का फैसला किया और उन्हें  लेने आए तो ऋषि मार्कंडेय शिवलिंग से लिपट गए और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने लगे फिर यमराज ने अपने यम पाश उनकी ओर फेंका जो गलती से शिवलिंग पर जा गिरा जिससे भगवान शिव क्रोधित हो गए और स्वयं प्रकट होके यमराज को कहा की तुम सिर्फ काल हो ओर मै महाकाल हूँ तुम यहाँ से चले जाओ । उसके बाद भगवान शिव ने  ऋषि मार्कंडेय की तपस्या ओर महामृत्युंजय मंत्र  के जाप से प्रसन्न होकर विधि के विधान को बदल कर ऋषि मार्कंडेय को दीर्घायु का वरदान दिया और यह भी कहा की संसार के अंत तक जो कोई भी महामृत्युंजय मंत्र का जाप करेगा उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा।

महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने के फायदे

वेदो और पुराणों में महामृत्युंजय मंत्र के जाप के बहुत फायदे बताये गए हैं। जैसे-

महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से भय से छुटकारा मिलता है।

पुत्र प्राप्ति, उन्नति और अकाल मृत्यु से बचने के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है।

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