ताड़केश्वर महादेव मंदिर उत्तराखंड – सारी जानकारी



ताड़केश्वर महादेव मंदिर उत्तराखंड

ताड़केश्वर महादेव मंदिर – ताड़केश्वर मंदिर भारत के उत्तराखंड राज्य के पौड़ी गढ़वाल जिले में लैंसडाउन हिल स्टेशन से लगभग 36 किलोमीटर दूर 1,800 मीटर की ऊंचाई में स्थित एक छोटे से गांव में भगवान शिव का सिद्धपीठ मंदिर है। यह स्थान भगवान शिव को समर्पित है।

तारकेश्वर मंदिर इस क्षेत्र के लगभग 85 से अधिक गांवों के कुल देवता हैं। यहाँ हर साल मंदिर में दो बार विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है, जिसमें भगवान शिव को ग्रामीणों द्वारा नई फसल अर्पित की जाती है। तथा कई लोग मंदिर में भंडारे भी करवाते हैं।

यह मंदिर चारो तरफ से देवदार के घने जंगलों से घिरा हुआ है। यहाँ पर बारामास ठंडा मौसम रहता है यह उन लोगों के लिए एक मनमोहक स्थान है जो प्रकृति की सुंदरता और शांति की तलाश में रहते हैं। कालिदास के खंडकाव्य रघुवंश के द्वितीय चरण में भी ताड़केश्वर मंदिर का मनमोहक वर्णन किया गया है और साथ ही साथ रामायण में भी एक दिव्य आलोकिक स्थल के रूप में ताड़केश्वर मंदिर का वर्णन है। यह मंदिर बहुत ही दिव्य और शांत है।

गर्मियों और शिवरात्रि के समय यह पर्यटकों और भगवान शिव के भक्तों के लिए मुख्य पर्यटन स्थल है।

ताड़केश्वर महादेव मंदिर उत्तराखंड – सारी जानकारी

ताड़केश्वर महादेव मंदिर कथा

एक पौराणिक कथा के अनुसार, तारकासुर नाम का एक राक्षस हुआ करता था जिसने वरदान पाने के लिए इस स्थान पर भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। तारकासुर की भक्ति से प्रसन्न होकर, भगवान शिव ने तारकासुर को मनवांछित वरदान मांगने को बोला, तब तारकासुर ने वरदान में भगवान शिव के पुत्र को छोड़कर कोई संसार में उसका वध न कर पाए ऐसा वरदान माँगा। क्योंकि उस समय में भगवान् शिव को कोई पुत्र नहीं था और न ही भगवान् शिव का विवाह हुआ था। वरदान पाते ही  तारकासुर ने  देवताओं पर आकर्मण कर दिया और एक-एक करके सबको पराजित कर दिया।

समय के साथ साथ तारकासुर के अत्याचार बढ़ने लगे तब सभी देवताओ और ऋषियों ने भगवान शिव से तारकासुर की मृत्यु के लिए अनुरोध किया। भगवान शिव ने सभी का अनुरोध सुनकर माता पार्वती से विवाह किया और फिर भगवान शिव के बड़े पुत्र कार्तिकेय का जन्म हुआ। फिर कार्तिकेय ने देवताओं का नेतृत्व करके तारकासुर का वध कर दिया।

लेकिन मृत्यु के समय तारकासुर ने भगवान शिव की स्तुति की और उनसे क्षमा मांगी तारकासुर की भक्ति से  प्रस्सन होकर भगवान शिव ने  तारकासुर  को कहा की जहाँ तूने मेरी तपस्या की थी वह स्थान तुम्हारे नाम से जाना जायेगा जिसमे तुम्हारे नाम के साथ मेरा नाम जोड़ा जायेगा और जो कोई भी भक्त सच्चे मन से इस स्थान में मेरा ध्यान करेगा उसकी सारी मनकामनाएं पूरी होंगी और इस पावन स्थान का नाम इस तरह तारकेश्वर महादेव पड़ गया।

ताड़केश्वर मंदिर ताल

यहाँ स्नान के लिए खुले ताल हैं जिनमे हमेशा ठंडा पानी रहता है। मंदिर में प्रवेश करने से पहले श्रद्धालु ताल में स्नान और हाथ-पैर साफ़ करते हैं। महिलाओं के लिए एक बंद ताल भी हैं। परिसर में एक कुंड है, जिसके पवित्र जल का उपयोग मंदिर के अंदर शिवलिंग पर चढ़ाने के लिए किया जाता है। यहाँ मान्यता है की जिसकी भी मनोकामना पूरी होती है वह मंदिर में एक घंटी दान करता है। आज मंदिर में हज़ारो घंटियां हैं जो पूरी परिसर में लगे हुए है और यह घंटियां इस बात का प्रमाण देती है कि भगवान तारकेश्वर ने कितने लोगो कि मन्नतें पूरी की है।

एक मान्यता यह भी है की जो मंदिर परिसर में कुंड है वह माता लक्ष्मी द्वारा निर्मित है इस कुंड के जल से भगवान तारकेश्वर के शिवलिंग का जलाभिषेक होता है।

महाशिवरात्रि पर यहाँ प्रतिवर्ष बड़ी धूमधाम रहती है, जिसमे भक्तों की बड़ी संख्या होती है। मंदिर के पास ही पर्यटकों के ठहरने के लिए दो धर्मशालाएं भी हैं।

तारकेश्वर मंदिर के 7 देवदार के वृक्षों की कथा

माना जाता है के ताड़कासुर के वध के बाद भगवान शिव ने यहां पर कुछ समय विश्राम के लिए आये थे । विश्राम के दौरान भगवान शिव पर सूर्य की तेज किरणें पड़ रही थीं तब माता पार्वती ने स्वयं सात देवदार के वृक्षों का रूप धारण किया। इसलिए आज भी मंदिर के आँगन के पास 7 देवदार के वृक्षों को देवी पार्वती का स्वरूप मानकर पूजा जाता है। उनमे से एक देवदार के वृक्ष के आकर्ति त्रिशूल के आकर की है।

ताड़केश्वर मंदिर में क्या ले जाना वर्जित है

यहाँ के पुजारियों और लोगो के अनुसार यहां पर सरसों का तेल और शाल के पत्तों का लाना सख्त वर्जित है।

ताड़केश्वर मंदिर कब और कैसे जाये

यदि आप ताड़केश्वर मंदिर जाना चाहते हो तो आपके लिए सबसे सही समय मार्च से अगस्त गर्मियों का होगा। गर्मियों में मंदिर सुबह 5 बजे से शाम के 7 बजे तक खुला रहता है। और सर्दियों में यह सुबह 6:30 से शाम के 5 बजे तक खुला रहता है। ताड़केश्वर मंदिर जाने के लिए आप कोटद्वार से होते हुए जा सकते है कोटद्वार से ताड़केश्वर मंदिर की दूरी लगभग 68 किलोमीटर हैं। ताड़केश्वर मंदिर जाने के लिए आप कोटद्वार से होते हुए जा सकते है कोटद्वार से ताड़केश्वर मंदिर की दूरी लगभग 68 किलोमीटर हैं।

कोटद्वार से ताड़केश्वर मंदिर जाते हुए आपको रास्ते में दुर्गा माता का मंदिर, लैंसडाउन छावनी, रास्ते में बने रिसोर्ट और चारों और से वृक्षों से ढकी वादियां देखने को मिलेगी और अंत में ताड़केश्वर मंदिर में मनमुग्ध करने वाली शांति का एह्साह।

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